Tuesday, October 23, 2007

व्यर्थ गंवाया अर्थ

हालाँकि नवदुर्गा उत्सव और दशहरे के सभी उत्सव खत्म हो चुके है परंतु उंकी खुमारी अभी भी सभी लोगों पर छाई ही होगी। अच्छा है कम से कम इन कुछ दिनों मे इतने सारे आयोजनो के माध्यम से लोग ईश्वर को उसके अस्तित्व का अह्सास दिला देते हैं। इन दिनो आयोजनों के नाम पर खूब पैसा इकट्ठा किया जाता है और उसे सजावट और विभिन्न कार्यक्रमों के भव्य आयोजनो के लिए खर्च भी किया जाता है। इन कुछ दिनों में शायद वे सभी लोग आस्तिक हो जाते हैं जिनका ईश्वर से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। ये लोग वर्ष भर तो गरीबों का खून चूस-चूस कर पैसा इकट्ठा करते हैं और इन कुछ दिनों में दिल खोल कर इन आयोजनों मे व्यय भी करते हैं। ऐसा लगता है जैसे भगवान को भी घूस दे रहे हों।
हिन्दुस्तान के अन्दर ऐसी कई मान्यताएं हैं जो मुझे अक्सर हास्यास्पद लगती हैं। और इन मान्यताओं का अनुशरण न करने के कारण मुझे कई बार कई प्रकार की यातनाओं का भी सामना करना पड़ता है। यहाँ तक की मेरे परिवार वाले भी मुझे नास्तिक और न जाने क्या-क्या कहते हैं। मेरा मन कभी भी यह स्वीकार नहीं कर पाता कि भगवान सिर्फ मन्दिर में ही है क्यों कि मैं तो बचपन से यही सुनता आया हूं कि वह सर्वव्यापी है, इसीलिए मैं मन्दिर नहीं जाता। और ऐसे ही न जाने कितनी ही मान्यताएं हैं जिन्हें मैं आस्था का विषय न मानकर सिर्फ ढकोसलों की श्रेणी में रखता हूं।
चलिए हम लोग विषय परिवर्तन न कर के सीधे अपने मूल विषय पर आते हैं। इस बार नवदुर्गा महोत्सव के समय हुए विभिन्न आयोजनों मे हुए व्यय के आँकड़े जब मेरे सामने आए तो एक तरफ तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ वहीं दूसरी तरफ दुःख भी। यदि जबलपुर शहर मात्र में हुए व्यय को ही लें तो इन दस दिनो में कुल मिला कर लगभग 25-30 लाख रुपयों का व्यय किया गया। एक ऐसा शहर जिसकी कुल आबादी लगभग 20 लाख है उसने नवदुर्गा महोत्सव मे 25-30 लाख रुपए खर्च किए। अब यदि इसी बात का दूसरे पक्ष पर दृष्टिपात किया जाए तो यहाँ की कुल आबादी का 20% अर्थात लगभग4 लाख लोग घोषित रूप से गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें दोनो वक़्त ठीक ढंग से पर्याप्त मात्रा में भोजन भी नसीब नहीं होता। अब यदि इस धन को लोग ऐसे आयोजनों की भव्यता में खर्च न कर के इन लोगों के उन्नयन मे लगाते तो मेरा ख्याल है की हम अपने आप को ईश्वर के करीब ले जाने में अधिक सफल होते। किसी ने ऐसे ही नहीं कहा है कि :-
मस्ज़िद है बहुत दूर चलो यूं कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।

Monday, October 15, 2007

एक तबका अभी भी छूट रहा है

चिट्ठों की शुरुआत हुए काफी समय बीत गया है। आज हिन्दी चिट्ठे अपने शैशवकाल से थोड़ा ऊपर उठ कर योवन के धरातल की तरफ अपने कदम बढ़ा रहे हैं। इतना ही नहीं चिट्ठों को मुख्य धारा के संचार माध्यमों के नए एवं सशक्त माध्यम के रूप मे भी देखा जा रहा है। यह स्वभाविक भी है क्यों कि चिट्ठों मे कमोवेश भ्रष्टाचार की संभावना कम है। इसका मूल कारण है इनके आर्थिक पहलू का न होना। जिस किसी भी चीज़ का आर्थिक पहलू नहीं होगा और जिसका उद्देश्य मात्र स्वयं का सुख और सेवा होगा वहां भ्रष्टाचार की संभावनाएं उतनी ही कम हो जाती है। अभी तक के सभी चिट्ठों को पढने के बाद एक बात जो सामने आई वह यह है कि आम तौर पर सभी चिट्ठों का सरोकार य तो साहित्य से है या फिर सामयिक राजनीतिक मुद्दों के विश्लेषण से। यहां एक तबका ऐसा रह जाता जो कि तथाकथित मुख्य धारा मे तो अपनी जगह बना ही नहीं पा रहा है परंतु भविष्य के वैकल्पिक मीडिया कहे जाने वाले इन चिट्ठों से भी अछूता रह गया है।
जी हाँ मैं बात कर रहा हूं हमारे समाज के वंचित तबकों की। उन लोगों की जिन्हें दोनो वक़्त का भोजन भी सही ढंग से उपलब्ध नहीं हो पाता,कपड़ों के नाम पर जो महज़ कुछ चिथड़े अपने बदन पर लपेटे रहते हैं, उन लोगों की जो अपनी सारी ज़िन्दगी फुटपाथ पर ही बिता देते हैं। चिट्ठाजगत पर साहित्य की बातें होती हैं, जीवन की अनुभूतियों की बातें होती हैं, भाषा के उन्नयन की बातें होती हैं, राजनीति की बातें होती हैं अर्थिक नीतियों की बातें होती हैं पर फिर भी भारतीय समाज का यह यह एक बड़ा तबका जिन्हें हम वंचितों की श्रेणी मे रखते हैं।जिन्हे हमारे समाज ने एक दम हाशिए पर रख दिया है हमारे चिट्ठे जगत से एक दम छूट गया है। ऐसा नहीं है कि इनसे जुड़े मुद्दे लोगों को उद्द्वेलित नहीं करते परंतु अगर आवश्यक्ता है तो एक सार्थक पहल की। आवश्यक्ता है तो अपनी शक्ति को पहचान कर उसे एक दिशा देने की। अब यहाँ से तो सभी के व्यक्तिगत विचारों का मंथन प्रारंभ होता है। तो मित्रो चलो हम सब अपने विचारों के मंथन मे थोड़ी जगह इन लोगों को भी दें। मुझे यकीन है कि इस मंथन में भी कुछ महत्वपूर्ण रत्न निकल कर आएंगे। मैं जानता हूं कि मेरे चिट्ठे की पठनीयता इतनी अधिक नहीं है कि वह अधिक लोगों को प्रभावित कर पाए परंतु यदि मेरा यह सन्देश यदि किसी एक व्यक्ति को भी इन मुद्दों पर लिखने के लिए प्रेरित कर पाया तो मैं समझूंगा कि मेरा लिखना सार्थक रहा। नहीं तो "एकला चलो" का नारा तो साथ है ही। अकेले इस सफर की शुरूआत की है अकेले ही चलूंगा। पर फिर भी यह अवश्य कहूंगा कि "आओ पहल करें"

Monday, October 1, 2007

भारत के कपूत-"महारथी"

आज शास्त्री जी के सारथी की एक पोस्ट के माध्यम से मैं एक महारथी जी से मिला। इनका नाम है जगत चंद्र पटराकर ये दर असल अपना तकल्लुस महारथी लगाते हैं। भाई साहब अंग्रेज़ी के अनन्य भक्त हैं और हिन्दी को भी रोमन लिपि में लिखने की वकालत करते हैं। इनके ब्लॉग का नाम है हंगामा है क्यूं बरपा । अरे भाई साहब जब आप मातम में जाकर हँसोगे तो भद्रा ही उतरेगी मुद्रा तो नहीं मिलेगी। मांफ कीजिएगा अपने इस सन्देश मेरी भाषा अपने स्तर से थोड़ा नीचे आ गई है। मैं तो बहुत कोशिश कर रहा हूं कि कुछ बुरा य अपशब्द न निकले पर क्य करूं। मैं जब किसी दूसरे की माँ का अपमान नहीं करता तो अपनी माँ का अपमान कैसे सहन कर सकता हूं? इसीलिए मैं अपने चिट्ठे के इस सन्देश के लिए अपनी भाषा के स्तर से थोड़ा नीचे आने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं। हाँ तो हम बात कर रहे थे इन महाशय महारथी जी की तो ये माननीय अपने चिट्ठे को देवनागरी में लिख कर हमारी देश की भाषाओं को रोमन लिपि मे लिखने का प्रचार कर रहे हैं। यानि महाराज जिस थाली में खा रहे हैं उसी में छेद कर रहे हैं। इतना ही नहीं इन्होंने अपने एक और बुद्धिहीन मित्र मधुकर एन. बोगटे जी के साथ मिल कर एक संस्था रोमन लिपि परिषद का भी निर्माण किया है जो इनके इस बेबकूफी भरे कार्य का प्रचार-प्रसार करेगी। और हां ज़रा इनकी हिमाकत तो देखिए ये हिन्दी चिट्ठाजगत मे आकर हिन्दी वालो से ये अपेक्षा रख रहे हैं कि हम लोग इन लोगों की इस निकृष्ट संस्था में शामिल होंगे। मुझे दुष्यंत जी का एक शेर याद आ रहा है:-
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें।
चाकू की पस्लियों से गुजारिश तो देखिए।
यह शेर शायद इन्हीं जैसे तुर्रमखानों से प्रेरित हो कर लिखा गया होगा। और हां शायद दुनिया के 140 विश्वविद्यालयों का संचालन मूर्ख कर रहे हैं जहां हिन्दी पढाई जा रही है। शास्त्री आप, समीर भाई आप, संजय बेंगाणी जी आप, रवि भाई आप और हिन्दी चिट्ठा जगत के सभी चिट्ठाकार भाईयो हम सभी बेबकूफ हैं जो यूं ही हिन्दी का परचम अंतर्रष्ट्रीय स्तर पर फहराने के लिए मरे-खपे जा रहे हैं। सिर्फ यही एक बुद्धिजीवी बचे हुए हैं धरती पर। अब पत नहीं बुद्धिजीवी या बुद्धूजीवी।
और महाशय महारथी जी आपके चिट्ठे पर दो टिप्पणियां छोड़ कर आया हूं इस उम्मीद में कि टिप्पणियाँ पढ़ कर तो आप यहाँ आयें और यह लेख पढ़ें। और हां आप इतने बड़े ज्ञानी बन रहे हैं आपको एक खुली चुनौती है। भारत की भाषाओं को रोमन लिपि में तो बाद में लिखिएगा अगर हिम्मत है तो उसके लिए पहले अपने स्वतंत्र स्वरों की व्यवस्था कर दीजिए बेचारी अपने उच्चारण के लिए अभी भी हिन्दी पर ही निर्भर है। और हां चूंकि ये हिन्दुस्तान है इसीलिये आप इतना कहने के बाद भी अभी तक सही सलामत हैं। अंत में एक बात और:-
जिसको न निजि भाषा, न निजि राष्ट्र का अभिमान है।
वो हृदय नहीं है पत्थर है और मृतक समान है।
महारथी जी आप सही में मर चुके हैं।

Saturday, September 29, 2007

ईश्वर नाम की तराज़ू

जोश मलीहाबादी का एक शेर है:-
इंसां का खून खूब पियो इज़्बे आम है।
अंगूर की शराब का पीना हराम है।
दरअसल इंसानो की इस दुनिया में इंसानो ने ईश्वर को खोज निकाला जिससे कि उसे तराज़ू की तरह उपयोग में लाया जा सके। उसके माध्यम से सही-गलत, अच्छे-बुरे, सच-झूठ आदि को तौला जा सके। ईश्वर की खोज एक आदमी को इंसान और जंगल को बस्ती बनाने के लिए भी आवश्यक थी परंतु समय के साथ आदमी उस तराज़ू का उपयोग कर के इंसान तो नहीं बन पाया परौसने इस तराज़ू को ज़रूर अलग अलग नामों से बाट डाला और इस तराज़ू के बंटने से धरती भी कई टुकड़ों में बंट गई। आदमी को इंसान बनाने के लिए ज़मीन पर जो वरदान उतरा था उसे इन आदमियों ने एक अभिशाप का रूप दे दिया। ये वही ईश्वर था जो भले ही अलग-अलग नामो से जाना जाता हो पर सिखाता सभी को प्रेम और सौहाद्र से रहना ही था। हर धर्म नाम से भले ही कितना ही भिन्न क्यों न हो पर उसकी सीख हमेशा भेद-भाव रहित जीवन ही रही है। जहाँ हिंदू धर्म मे ईश्वर कण-कण मे बसता है वहीं इस्लाम में वह तमाम आलमों का रखवाला है। बाईबल में जब प्रकाश को जागृत होने का हुक्म दिया गया था तो वह रोशनी सारे संसार के लिये थी न कि केवल ईसाईयों के लिये। नानक ने भी एक ही नूर से सारे जग के उपजने की सीख दी है। और कबीर ने तो इन सभी बातें का और धर्मग्रंथों का सार ही सिर्फ ढाई अक्षरों मे दे दिया-प्रेम। परंतु कालांतर में हमने इन सभी को बस अपने स्वार्थ के लिये ही प्रयोग करना शुरू कर दिया। और आज भी हम सब इन सभी पवित्र ग्रंथों को, इनकी शिक्षाओं को,इनके नामो को बस अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये तोड मरोड़ कर इन्हे इनके मूल रूप से विकृत कर अपने अनुरूप ढाल कर प्रस्तुत करने में लगे हुए हैं। जो सारे विवादो, सारी विकृतियों, सारी परेशानियों की जड़ है।
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Friday, September 28, 2007

फ़तवे की राजनीति

हाल ही में कुछ दिनों पहले बरेली के एक मौलवी ने सलमान खान के खिलाफ सिर्फ इसीलिये फ़तवा ज़ारी कर दिया था क्यों कि उन्होने गणेश पूजा में शिरकत की थी। हालांकि इस फ़तवे को इतनी तवज़्ज़ो नहीं दी गयी परंतु यह फ़तवा आज-कल धड़ाधड़ ज़ारी किये जा रहे फ़तवो और उन पर सवार राजनीति पर एक सवालिया निशान लगा देते हैं। चाहे वह फ़तवा तसलीमा नसरीन पर हो या सलमान खान पर।
जहां तक तसलीमा नसरीन के ऊपर ज़ारी किये गये फ़तवे की बात है तो तो उन पर फ़तवा उनकी किताब ‘लज्जा’ के लिये ज़ारी किया गया था। और जितना मुझे याद है इस्लाम के खिलाफ कुछ नहीं लिखा था। उसमें सिर्फ और सिर्फ बांग्लादेश में हुए दंगों के दौरान की स्थिति का ही वर्णन किया गया था। और अब यह फतवा जो सलमान खान पर ज़ारी किया गया है उसने तो अपनी सारी हदें ही तोड़ दी हैं। इस फ़तवे ने न केवल इस्लाम की छबि को ही धूमिल किया है बल्कि इसने फ़तवे की महत्ता को भी कम कर दिया है। यदि सलमान पर लगाए गए इस फतवे के माध्यम से बात करे तो शायद वे मौलवी जिन्होने यह फ़तवा ज़ारी किया है या तो वे असल मे मौलवी बनने लायक ही नहीं हैं या फिर उन्हें इसलाम की सही समझ नहीं है। दरअसल वे एक सच्चे मुसलमान कहलाने लायक ही नहीं हैं। क्यों कि इस्लाम में मुसलमान का अर्थ होता है जिसका ईमान मुसल्लम(पवित्र) हो और जिसका ईमन पवित्र होता है वह सभी धर्मों के सह-अस्तित्व पर विश्वास रखता है। यहा तक कि क़ुरान मे भी सभी धर्मों के सह-अस्तित्व की बात कही गई है। उसमे कहीं भी किसी दूसरे धर्म को नीचा समझने या दिखाने पर ज़ोर नहीं दिया गया है और जो तथाकथित इस्लामी धर्मगुरू दूसरे धर्म को नीचा दिखाने उनके अस्तित्व को नकारने की बात करते हैं वे इस्लाम और उसकी शिक्षाओं दोनो का गलत संदेश दुनिया को देते हैं। और दुनिया भर में इसलाम और मुसलमानों को बदनाम कर रहे हैं।

Thursday, September 27, 2007

विभाजन का दंश







मेरे एक चिट्ठाकार मित्र अनिल रघुराज जी ने एक टिप्पणी की थी कि “यह बडी विडंबना है कि विभाजन के 60 वर्षों बाद भी हमारे दिलोदिमाग में विभाजन बरकरार है। क्या विभाजन के इस घाव को किसी तरह भरा नहीं जा सकता?” मैं भी सोचता हूं कि वास्तव में 14-15 अगस्त 1947 मे हमने आज़ादी पाई या फिर विभाजन। अंग्रेज़ों ने एक झटके में ही हिंदुस्तान की गंगा-जमुना संस्कृति को दूध की तरह फाड़ डाला। यह वह समय था जब एक उपलब्धि और एक दुर्घटना साथ घटी थी। इतिहास में शायद ऐसा पहली और आखिरी बार हुआ था। उपलब्धि थी स्वतंत्रता की और दुर्घटना थी विभाजन की। ऐसा नहीं था कि यह दुनिया का पहला विभाजन था। इससे पहले भी कुछ देशों के विभाजन हुये थे परंतु यह विभाजन युग की सबसे बडी त्रासदी थी क्यों कि यह विभाजन महज़ ज़मीन या देश का विभाजन नहीं था। बल्कि यह विभाजन था लोगों का, उस हवा का जो इस ज़मीन से उस ज़मीन की तरफ चलती है, उन नदियों का जो इन दोनो देशों की सीमाओं पर बहती हैं, पंछियों का, दिलों का और संस्कृतियों का। यह बंटवारा था इकबाल और मीर का, टैगोर और नज़रूल इस्लाम का, राम और रहीम का। हमारी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य, संगीत हर चीज़ को अंग्रेज़ अपनी तेज़ धार वाली दिमागी तलवार से काट कर चले गये। और साथ मे दे गये एक ऐसा घाव जिसे भरने में सदियां लग जाएंगी और अगर यह घाव भर भी गया तो अपने निशान ज़रूर छोड़ जायेगा। हमारी आज़ादी का संघर्ष जितना रक्तमय रहा है उससे कहीं अधिक रक्तमय रही है हमारी आज़ादी। उस समय विभाजन की त्रासदी आज़ादी के उल्लास पर भारी थी, आज भी है और हमेशा रहेगी। क्यों कि उस विभाजन की छुरी सिर्फ ज़मीन पर नही चली बल्कि दिलों पर चली है। और उस विभाजन की कसक आज भी महसूस की जा रही है। और अंग्रेज़ो द्वारा दिये गये इस दंश का ज़हर आज भी दोनों देशों की रगों मे दौड़ रहा है।

Wednesday, September 26, 2007

गणपती बप्पा मोरेया






कहा जाता है कि एअ तस्वीर 10,000 शब्दों के बराबर होती है।यहां ऊपर जो तस्वीर की श्रंखला है वह अपने आप में सम्पूर्ण है। और इसे अपने अभिव्यक्ति के लिये शब्दों की आवश्यक्ता नहीं है। परंतु गणपति विसर्जन के बाद गणपति की मूर्तियों की यह स्थिति मन में कुछ प्रश्न उठा देती है कि क्या यही है हमारी साधना और हमारी आस्था? क्या हमारी भक्ति सिर्फ गणपति पर्व के उन चंद दिनों तक ही सीमित है? क्या हमारी आस्था सिर्फ भगवान का नाम लेकर वोतों की राजनीति करने और धार्मिक उन्माद फैलाने के लिये ही है?
यदि हम किसी को सुगति प्रदान नहीं कर सकते तो कम से कम उसे दुर्गति तो प्राप्त ना होने दें। मेरी नज़र में ऐसे तथाकथित आस्तिकों एवं साधकों से वह नास्तिक ज़्यदा बेहतर है जो अपनी आस्था का झूठा ढोल नहीं पीटता। अब हमें स्वयं को ही यह निर्णय लेना है कि हम कैसे साधक हैं- Idol, Idea या फिरl Idle

Tuesday, September 25, 2007

आस्था और विज्ञान

पेंजिया-प्ररंभिक पृथ्वी

रामायण में सेतु निर्माण का चित्र

नासा द्वारा लिया गया रामसेतु का छायाचित्र



कुछ वर्षों पहले इसकॉन मंदिर की वेबसाइट ने अपने एक लेख में लिखा था कि नासा द्वारा लिये गये कुछ छायाचित्रों में भारत और श्रीलंका को जोडने वाले उस सेतु के भी छायाचित्र हैं जिसका प्रयोग भगवान राम ने त्रेतायुग मे असुर रावण की लंका नगरी तक जाने के लिये किया था। और इस सेतु की संरचना और बनावट यह दर्शाती है कि यह एक मानव निर्मित सेतु है। पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार श्रीलंका मे मानव जीवन की शुरुआत लगभग 1,750,000 वर्षों पूर्व हुई थी और इस सेतु की उम्र भी लगभग इतनी ही बताई जा रही है।
अब अगर ये लेख सच है तो फिर यह रामायण की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिये एक बहुत महत्वपूर्ण सूत्र है। क्योंकि त्रेतायुग, जिसमें रामायण घटित हुई, का काल भी लगभग यही था यानि 1,700,000 वर्ष पहले। परंतु यहां एक बहुत बडी समस्या यह उत्पन्न होती है कि अभी तक जो अवशेष मिले हैं उनसे यह प्रमाणित होता है कि पृथ्वी पर वर्तमान मानव होमोसेपिअंस की शुरुआत 150,000 से 180,000 वर्षों पहले ही हुई है। और आदि मानव यानि होमोइरेक्टस अफ्रिका से लगभग 750,000 वर्षों पहले ही बाहर निकले हैं। यदि इन तथ्यों की माने तो 1,700,000 वर्षों पहले तो एक कुल्हाडी भी नहीं थी रामायण मे उपयोग में लाये गये हथियार तो बहुत दूर की बात है। परंतु यहां एक बात और गौर करने वाली है कि यदि यह मान लिया जाये कि रामायण पूर्णतः काल्पनिक है तो क्या उस समय किसी व्यक्ति के लिये इतने उन्नत हथियारों की कल्पना करना संभव था? तो इसके लिये यह कहा जा सकता है कि जब एच.जी.वेल्स टाइम मशीन की कल्पना कर सकते हैं तो वाल्मिकि इन हथियारों की क्यों नहीं।
अब यदि विज्ञान और आस्था के मध्य फंसे इस विषय के प्रभाव की बात करे तो क्या हम अपनी आने वाली पीढी को कहीं गुमराह तो नहीं कर रहे? क्यों कि यदि कोई रामायण या अन्य धर्मग्रंथ की सार्थकता या उसकी प्रमाणिकता से संबंधित सवाल पूछता है तो हम उसे चुप करा देते हैं। और आज कल विद्यार्थियों को विज्ञान और आध्यात्म दोनो विषय एक साथ पढाए जाते हैं। और यदि कोई विद्यार्थी या व्यक्ति यदि विज्ञान की प्रमाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है तो उसे निहायत ही मूर्ख कहा जाता है और यदि वह इन ग्रंथों की प्रमाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है तो आज भी उसके साथ ठीक वैसा ही व्यवहार किया जाता है जैसा कि गेलीलियो के साथ तब किया गया था जब उसने यह घोषित किया था कि सूर्य पृथ्वी के चक्कर नही लगाता बल्कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है। और यदि आज 21वीं सदी में भी यदि हम यही मानसिकता विकसित कर रहे है तो इसमें कोई दो राहें नहीं कि हमारी आने वाली पीढी भी इसी बात पर विश्वास करेगी कि एक गाय की जान पांच दलितों की जान से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।

रामसेतु हेतु

नासा द्वारा ली गयी रामसेतु की तस्वीर







बहुत दिनो से राम सेतु विवाद पर सुन और पढ रहा हूं। तो मुझे यह लग रहा है कि हिन्दुस्तान की राजनीति को क्या हो गया है जो तिल जैसे मुद्दे को ताड़ जैसा मुद्दा बना दिया। दरअसल रमसेतु पर जो भी विवाद है उस सारे विवाद की जड़ है सेतुसमुद्रम केनाल प्रोजेक्ट। अगर यह प्रोजेक्ट ना होता तो यह विवाद भी उतपन्न न होता। तो अब सवाल यह उठता है कि यह सेतुसमुद्रम केनाल प्रोजेक्ट है क्या और इसके फायदे और नुकसान क्या हैं। बात यह है कि सेतुसमुद्रम केनाल प्रोजेक्ट के माध्यम से सरकार रामसेतु या अडम्स ब्रिज को बीच मे से काट कर बडे-बडे जहाज़ों के लिये रास्ता बनाना चहती है। इससे सीधा-सीधा लगभग 350 नॉटिकल माइल्सय फिर 650 किलो मीटर का रास्ता कम हो जायेगा जिससे व्यवसाय मे बहुत मुनाफा होगा। और भारत को उसके अर्थिक सशक्तिकरण में काफी सहायता करेगा।
परंतु वहीं इस परियोजना के पूर्ण हो जाने के बाद वहां के लगभग 200,00,000 मछुआरों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पडेगा। इतना ही नहीं बल्कि आगे अगर कभी सुनामी तूफान आया तो उसके प्रभाव को भिइ बढा देगा और इस परियोजना के पूर्ण हो जाने के बाद भारत को उसके थ्योरिअम डिपोज़िट्स भी बहुत कम हो जायेंगे जो कि न्यूक्लिअर रिएक्टर के ईंधन के रूप में काम आ सकते हैं।
तो यदि इस नज़रिये से देखें तो सेतुसमुद्रम केनाल प्रोजेक्ट् से लाभ कम और हानियां ज़्याद हैं। और जो लाभ हैं वह भी देश के पूंजिपतियों के लिये ज़्यादा है और आम भारतवासियों के लिये कम। और रही बात इस प्रोजेक्ट के दूरी वाले एक मात्र लाभ की तो मध्य पूर्व, अफ्रिका, मॉरीशस, एवं यूरोप से आने वाले जहाज़ों को इस परियोजना से केवल 8-10 घंटों का ही लाभ होगा। और वर्तमान कीमत को देखा जाये तो यदि यूरोप या अफ्रीका से आने वाले जहाज़ इस केनाल का उपयोग करेंगे तो वर्तमान दर के हिसाब से उन्हें प्रति यात्रा पर लगभग 4992 डॉलर का घाटा होगा और यह घाटा इसीलिये महत्वपूर्ण है क्यों कि इस रास्ते का उपयोग करने वाले 65% जहाज़ यूरोप और अफ्रीका के ही होंगे। और यदि कीमतों को इतना घटाया गया कि इन जहाज़ों को घाटा न हो तो इस परियोजना की आई.आर.आर.(इंटरनल रिटर्न रेट) 2.6% तक गिर जायेगी। और यह वह स्तर है जिस पर प्रशासन द्वारा जन-उपयोगी अधोसंरचनाओं की परियोजनाएं भी अस्वीकार कर दी जाती हैं।

भारत ने पाकिस्तान को पछाड़ा

आज दो खबरों पर एक साथ नज़र पडी पहली तो यह कि भारत ने 20-20 विश्व कप मे पाकिस्तान को हराया और दूसरी यह कि ब्रिटेन के लंदन शहर में आपराधिक गतिविधियों में लिप्त सामुदायों में भारतीयों की संख्या पाकिस्तानियों से अधिक है और इस सूची में भी भारत ने पाकिस्तान को पछाड़ दिया है। एक साथ दो-दो क्षेत्रों मे पाकिस्तान को पछड़ना किसी भी हिन्दुस्तानी के लिये गर्व की बात होती है चाहे वह क्षेत्र कोई भी क्यों न हो।
यदि फाइनल मैच की बात करें तो जीत के बाद सभी चैनलों ने बाकी सभी समाचारों को छोड़ कर बस मैच और जीत के जश्न के फुटेज दिखाने शुरू कर दीं। और इन फूटेज्स में मुख्य बात जो नज़र आयी वह यह थी कि अधिकतर लोगों को भारत के जीतने की खुशी से अधिक पाकिस्तान के हारने की खुशी थी। जहाँ देखो वहाँ हिन्दुस्तान के समर्थन में कम और पाकिस्तान के विरोध में ज़्यादा नारे लगाए जा रहे थे। मैं भी भारत की जीत पर उतना ही खुश होता हूं जितना कि कोई अन्य भारतवासी परंतु मैं सिर्फ भारत की जीत का ही जश्न मनाता हूं न कि किसी अन्य की हार का। और मैं अपने अन्य भारतीय बन्धुओं से भी यही अपेक्षा रखता हूं कि वे भी सिर्फ भारत की जीत का ही जश्न मनायें। क्योंकि भारत की रीति सदैव से प्रीत ही रही है न कि दुर्भावना या द्वेश। और यही करण है कि आज भी भारत की संस्कृति अक्षुण्ण एवं समस्त संस्कृतियों में अग्रणी है।
और अब अगर दूसरी खबर की बात करें और लंदन पुलिस के आंकडो पर गौर करें तो हम पाते हैं कि ब्रिटेन में आपराधिक गतिविधियों मे लिप्त अप्रवासी सामुदायों मे भारतीय 748 अपराधों, जिनमें 235 हिंसक अपराधों की श्रेणी में आते हैं, के साथ आठवे स्थान पर हैं जबकि पाकिस्तानी 591 अपराधों, जिनमें 177 हिंसक अपराध शामिल हैं, के साथ दसवें स्थान पर हैं। परंतु यहां मैं यह कहना ज़रूरी समझता हुं कि इन आंकडो का अर्थ यह कतई नही है कि सभी भरतीय अपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं। और यदि कोई व्यक्ति इन आंकडो को देख कर यह धारणा बना लेता है तो वो सर्वथा अनुचित है। क्योंकि किसी सामुदाय य मुल्क के कुछ लोगों की गतिविधियों य उनके कार्यों का हवाला दे कर उस सामुदाय या देश के प्रति किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर कोई धारणा बना लेना बिल्कुल गलत है। इस विषय पर लिखा तो बहुत जा सकता है परंतु मैं अपने आप को सिर्फ इतना ही कह कर विराम दूंगा कि बलवाइयों का न तो कोई धर्म होता है और न ही कोई मुल्क। और यह बात किसी और मुल्क के लिये भी उतनी ही सच है जितनी कि हमारे लिये।

Monday, September 24, 2007

स्थायित्व और भारतीय

अभी हाल ही में महेन्द्र सिंह धोनी को भरतीय क्रिकेट टीम का कप्तान चुना गया।और ज़ाहिर सी बात है कि जमशेदपुर से उठे इस खिलाडी के द्वारा प्राप्त की गयी इस उपलब्धि का जश्न न केवल जमशेदपुर में बल्कि पूरे हिन्दुस्तान में मनाया गया। मनाया भी जाना चाहिये क्यों कि महज़ तीन साल में भरतीय क्रिकेट टीम के कप्तान का पद प्राप्त करना कोई हंसी खेल थोडे ही है। और वर्तमान 20-20 विश्व कप के फाइनल में पहुँचने वाले वाक़्ये ने तो इस बात में और चार चाँद लगा दिये। जश्न अपने चरम पर पहुंच गया। और यदि भारत यहाँ कप जीत जाता है तो हमारे देश के करोडों लोग पूरी टीम और खास कर महेन्द्र सिंह धोनी को सिर आँखों पर बिठा लेगी।
परंतु हम हिंदुस्तानियों की यह कमज़ोरी समझ लीजिये या फिर ताकत कि हम हर चीज़ को बहुत जल्दि भुला देते हैं। मैं ऐसा इसी लिये कह रहा हूं क्यों कि यह वही लोग हैं जिन्होने विश्व कप मे पराजय के बाद धोनी के घर पर पथराव किया था और उन्हे ज़ेड सुरक्षा लेने के लिये मजबूर कर दिया था। हम लोग बहुत जल्दि किसी को अपने सिर पर चढा भी लेते हैं और उतनी हि जल्दि उसे उतार भी देते हैं। सचिन, गंगुली, कपिल, अज़हर, जडेजा, कपिल जैसे न जाने कितने ही उदाहरण हमे मिल जायेंगे जो हमारी नज़रों में चढे, उतरे और फिर चढे। परंतु स्थायित्व किसी को नहीं मिल पाया।
कहा जाता है ना कि जहां पानी के बहाव में स्थायित्व आ जाता है वहां वह सडने लगता है। शायद इसी लिये हम किसी को भी अपनी नज़रों में स्थायित्व नहीं देते।

 

© Vikas Parihar | vikas